आज सुबह, माह-ए-अक्टूबर में अचानक चल रही ठंडी हवा से मुझको ये ख़याल आया…

अजीब सी हो गयीं हैं मौसम में तब्दीलियाँ आज कल

इंसान के मिज़ाज की तरह, ना क़ाबिले ऐतबार, अचानक सी

कभी सोचता हूँ मैं उस तरफ़

जहाँ से अक्सर शुरू होते हैं मसले बोहोत से

मिज़ाज की तब्दीलियाँ कैसे बन जाती हैं वजह

ना-हल या फिर तन जाने वाले ना-इत्तफ़ाक़ियों की

हम ने सीखा नहीं कभी एक छोटे सा सलीक़ा

जिससे शायद सकूँ हो दो हमराह के सफ़र में

जियो और जीने दो, हर शकस को अपनी मर्ज़ी से अपना हर क़दम चलने दो

ये मौसम भी शायद अब तंग आ गया होगा अपने वक़्त पर तब्दील होने से

सोचता होगा, इंसानों पर क्यों महर करूँ जब वो ही ख़ुदगर्ज़ हों

बदल जाऊँ में भी जब जैसे चले हवा, इंसानो का क्या है, आदत है उनको तंग करने की और सब सहने की

ऐ इंसान, अब जब तुझको ये ख़याल आए

अचानक कैसे बदला आज मौसम, कुछ वक़्त ये भी ख़याल कर लेना, तेरी फ़ितरत से तो बेहतर है मौसम का तब्दील होना